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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) चन्दन और तेल आदि के मर्दन को (आहरन्ति) वे [गृहस्थ लोग] प्राप्त होते हैं, (तत्) सब [संन्यासी के लिये] (आज्यम्) [संसार का] व्यक्त करनेवाला ब्रह्म (एव) ही है ॥११॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी पुरुष परमात्मा के चिन्तन में अपनी शरीरशोभा समझता है ॥११॥
टिप्पणी: ११−(यत्) यदा (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-ल्युट्। सम्यक् चन्दनादिलेपनं तैलादिमर्दनं च (आहरन्ति) (आज्यम्) अ० ५।८।१। आङ्+अञ्जू व्यक्तौ-क्यप्। संसारस्य व्यक्तिकरं ब्रह्म (एव) (तत्) तदा ॥
