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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (कशिपूपबर्हणम्) विछौना और बालिश को वे [गृहस्थ लोग] (आहरन्ति) प्राप्त होते हैं, [संन्यासी के लिये] (ते) वे [प्रसिद्ध ईश्वर की] (एव) ही (परिधयः) सब ओर से धारणशक्तियाँ हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी शारीरिक सुख की उपेक्षा करके परमेश्वर का अवलम्बन करता है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(यत्) यदा (कशिपूपबर्हणम्) कशिपुर्व्याख्यातः-अ० ६।१३८।५। उपबर्हणं व्याख्यातम्-अ० ९।५।२९। परिस्तरणं बालिशं च (आहरन्ति) (परिधयः) उपसर्गे घोः किः। पा० ३।३।९२। परि+दधातेः-कि। ईश्वरस्य परितो धारणशक्तयः (एव) (ते) प्रसिद्धाः ॥
