ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चौदनः) पाँच भूतों [पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश] से सींचा हुआ [जीवात्मा] (पञ्चधा) पाँच प्रकार [गन्ध, रस, रूप, स्पर्श शब्द से] (त्रीणि) तीन [शरीर इन्द्रिय और विषय] (ज्योतींषि) ज्योतियों [दर्शनसाधनों] को (आक्रंस्यमानः) पाने की इच्छा करता हुआ (वि क्रमताम्) विक्रम [पराक्रम करे] (ईजानानाम्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण, दान] कर चुकनेवाले (सुकृताम्) सुकर्मियों के (मध्यम्) मध्य में (प्र) आगे बढ़कर (इहि) पहुँच, और (तृतीये) तीसरे [जीव प्रकृति से भिन्न] (नाके) सुखस्वरूप परमात्मा में (अधि) अधिकारपूर्वक (वि श्रयस्व) फैलकर विश्राम ले ॥८॥
भावार्थभाषाः - विवेकी पुरुष पृथिवी आदि पञ्च भूतों और उनके गन्ध आदि गुणों द्वारा संसार के शरीर, इन्द्रिय और विषय का ज्ञान प्राप्त करके धर्मात्माओं में महाधर्मात्मा होकर परमात्मा की शरण लेता है ॥८॥