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प्र प॒दोऽव॑ नेनिग्धि॒ दुश्च॑रितं॒ यच्च॒चार॑ शु॒द्धैः श॒फैरा क्र॑मतां प्रजा॒नन्। ती॒र्त्वा तमां॑सि बहु॒धा वि॒पश्य॑न्न॒जो नाक॒मा क्र॑मतां तृ॒तीय॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । पद: । भव । नेनिग्धि । दु:ऽचरितम् । यत् । चचार । शुध्दै: । शफै: । आ । क्रमताम् । प्रऽजानन् । तीर्त्वा । तमांसि । बहुऽधा । विऽपश्यन् । अज: । नाकम् । आ । क्रमताम् । तृतीयम् ॥५.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे ईश्वर !] [इसके] (पदः) पद [अधिकार] से (दुश्चरितम्) उस दुष्ट कर्म को (प्र) अच्छे प्रकार (अव नेनिग्धि) शुद्ध कर दे, (यत्) जो कुछ (चचार) उस [जीव] ने किया है, (प्रजानन्) बड़ा ज्ञानवान् वह (शुद्धैः) शुद्ध (शफैः) सूक्ष्म विचारों से (आ क्रमताम्) ऊपर चढ़ जावे। (तमांसि) अन्धकारों को (तीर्त्वा) पार करके, (बहुधा) अनेक प्रकार से (विपश्यन्) दूर-दूर देखता हुआ (अजः) अजन्मा वा गतिशील जीवात्मा (तृतीयम्) तीसरे [जीव और प्रकृति से अलग] (नाकम्) सुखस्वरूप परमात्मा को (आ क्रमताम्) यथावत् प्राप्त करे ॥३॥
भावार्थभाषाः - योगी जन ज्ञान द्वारा अविद्या आदि अन्धकारों से छूटकर शुद्ध मुक्तस्वरूप परमात्मा की शरण लेकर बड़ा दूरदर्शी होकर आनन्द भोगता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(प्र) प्रकर्षेण (पदः) पद स्थैर्ये गतौ च-क्विप्। पदात्। अधिकारात् (अव) सर्वथा (नेनिग्धि) णिजिर् शौचपोषणयोः-लोट्। शोधय (दुश्चरितम्) दुष्कर्म (यत्) (चचार) कृतवान् (शुद्धैः) निर्मलैः (शफैः) शम शान्तिकरणे आलोचने च-अच्, मस्य फः। सूक्ष्मविचारैः (विपश्यन्) परितोऽवलोकयन्। अन्यत्पूर्ववत्-म० १ ॥