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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अनुपूर्ववत्साम्) यथाक्रम [एक के पीछे एक] बच्चेवाली (धेनुम्) गौ, (अनड्वाहम्) अन्न पहुँचानेवाला बैल, (उपबर्हणम्) वालिश [सिराहने का वस्त्र आदि], (वासः) वस्त्र, (हिरण्यम्) सुवर्ण (दत्त्वा) दान करके (ते) वे [धर्म्मात्मा लोग] (उत्तमाम्) उत्तम (दिवम्) गति (यन्ति) पाते हैं ॥२९॥
भावार्थभाषाः - धर्म्मात्मा मनुष्य सुपात्रों को विविध प्रकार दान करके उनकी उन्नति से अपनी उन्नति करते हैं ॥२९॥
टिप्पणी: २९−(अनुपूर्ववत्साम्) यथाक्रमशिशुमतीम् (धेनुम्) तर्पयित्रीं गाम् (अनड्वाहम्) अ० ४।११।१। अनस्+वह प्रापणे-क्विप्। अन्नप्रापकं वृषभम् (उपबर्हणम्) उप+बृह वृद्धौ उद्यमे च-ल्युट्। शिरोधानम्। वालिशम् (वासः) वस्त्रम् (हिरण्यम्) सुवर्णम् (दत्त्वा) (ते) धार्मिकाः (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (दिवम्) दिवु गतौ-डिवि। गतिम् (उत्तमाम्) श्रेष्ठाम् ॥
