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स॑मा॒नलो॑को भवति पुन॒र्भुवाप॑रः॒ पतिः॑। यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

समानऽलोक: । भवति । पुन:ऽभुवा । अपर: । पति: । य: । अजम् । पञ्चऽओदनम् । दक्षिणाऽज्योतिषम् । ददाति ॥५.२८॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:28


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अपरः) दूसरा (पतिः) पति (पुनर्भुवा) दूसरी वा विवाहित [वा नियोजित] स्त्री के साथ (समानलोकः) एक स्थानवाला (भवति) होता है। (यः) जो पुरुष (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥२८॥
भावार्थभाषाः - जैसे आत्मत्यागी परमेश्वर भक्त अपत्नीक पुरुष और धर्मात्मा विधवा स्त्री यथावत् विधि के साथ विपत्ति से छूटकर कर्तव्य पालन करते हैं, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी पुरुष अविद्या से छूट कर परमात्मा से मिलकर आनन्द पाता है ॥२८॥
टिप्पणी: २८−(समानलोकः) एकस्थानः (भवति) (पुनर्भुवा) पुनः+भू सत्तायाम्-क्विप्। पुनर्भूर्दिधिषू रूढा द्विस्तस्या दिधिषुः पतिः। स तु द्विजोऽग्रेदिधिषूः सैव यस्य कुटुम्बिनी। इत्यमरः १६।२३। द्विरूढया नियोजितया वा स्त्रिया सह (अपरः) द्वितीयः। देवरः (पतिः) अन्यत् पूर्ववत् ॥