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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (या) जो स्त्री (पूर्वम्) पहिले (पतिम्) पति को (वित्त्वा) पाकर (अथ) उसके पीछे [मृत्यु आदि विपत्तिकाल में] (अन्यम्) दूसरे (अपरम्) पिछले [पति] को (विन्दते) पाती है [उसी प्रकार जो पति मृत्यु आदि विपत्ति में दूसरी स्त्री को पाता है], (तौ) वे दोनों (च) निश्चय करके (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमेश्वर को [अपने आत्मा में] (ददातः) समर्पित करें (न वि योषतः) वे दोनों अलग न होवें ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जैसे विपत्तिकाल में स्त्री दूसरे पति को और पुरुष दूसरी स्त्री को प्राप्त होकर सुख पाते हैं, वैसे ही मनुष्य परमात्मा को पाकर दुःखों से छूटकर सुखी होते हैं ॥२७॥
टिप्पणी: २७−(या) स्त्री (पूर्वम्) विवाहितम् (पतिम्) स्वामिनम् (वित्त्वा) विद्लृ लाभे−क्त्वा। लब्ध्वा (अन्यम्) द्वितीयं पतिम् (विन्दते) लभते (अपरम्) नियोजितं पतिम् (पञ्चौदनम्) पञ्चभूतसेचकम् (च) अवश्यम् (तौ) स्त्रीपुरुषौ (अजम्) अजन्मानं गतिशीलं वा परमात्मानम् (ददातः) घोर्लोपो लेटि वा। पा० ७।३।७०। इति रूपसिद्धिः। दद्याताम् (न) निषेधे (वि योषतः) यु मिश्रणामिश्रणयोः-लेट्। वियुक्तौ भवेताम् ॥
