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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पक्वः) पक्का [दृढ़ स्वभाव], (पञ्चौदनः) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] से सींचा हुआ (निर्ऋतिम्) महाविपत्ति को (बाधमानः) हटाता हुआ (अजः) अजन्मा वा गतिशील जीवात्मा (स्वर्गे) सुख प्राप्त करानेवाले (लोके) लोक में [आत्मा को] (दधाति) रखता है, (तेन) उसी [उपाय] से (सूर्यवतः) सूर्य [प्रकाश] वाले (लोकान्) लोकों को (जयेम) हम जीतें ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार निश्चल बुद्धिवाला मनुष्य महाविघ्नों को हटाकर सुख भोगता है, वैसे ही सब मनुष्य विद्या द्वारा पुरुषार्थ करके सुखी होवें ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(अजः) म० १। अजन्मा गतिशीलो वा जीवात्मा (पक्वः) दृढस्वभावः (स्वर्गे) सुखप्रापके (लोके) दर्शनीये स्थाने (दधाति) स्थापयति, जीवमिति शेषः (पञ्चौदनः) म० ८। पृथिव्यादिपञ्चभूतैः सिक्तः (निर्ऋतिम्) अ० २।११।२। कृच्छ्रापत्तिम् (बाधमानः) निवारयन् (तेन) उपायेन (लोकान्) (सूर्यवतः) विद्याप्रकाशयुक्तान् (जयेम) उत्कर्षेण प्राप्नुयाम ॥
