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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वन् ! (येन) जिस (येन) नियम से (सहस्रम्) बलवान् पुरुषों को (सर्ववेदसम्) सब प्रकार के ज्ञानों वा धनों से युक्त [यज्ञ] में (वहसि) तू ले जाता है, (तेन) उसी [नियम] से (नः) हमें (इमम्) इस (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य यज्ञ में (देवेषु) विद्वानों के बीच (स्वः) सुख (गन्तवे) पाने के लिये (वह) ले चल ॥१७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के बीच सुख प्राप्त करने के लिये सदा प्रयत्न करते रहें ॥१७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजु० १५।५५। है तथा स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में भी व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: १७−(येन) प्रयत्नेन (सहस्रम्) सहो बलम्-निघ० २।९। रो मत्वर्थे। बलवन्तं पुरुषम् (वहसि) प्रापयसि (येन) यम-ड। नियमेन (अग्ने) हे विद्वन् (सर्ववेदसम्) सर्वाणि वेदांसि ज्ञानानि धनानि वा यस्मिन् तं यज्ञम् (तेन) (इमम्) क्रियमाणम् (यज्ञम्) संगन्तव्यं व्यवहारं प्रति (नः) अस्मान् (वह) नय (स्वः) सुखम् (देवेषु) विद्वत्सु (गन्तवे) तुमर्थे तवेप्रत्ययः। प्राप्तुम् ॥
