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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अज) हे अजन्मे जीवात्मा ! (अजः असि) तू गतिशील है, (स्वर्गः असि) तू सुख प्राप्त करनेवाला है, (त्वया) तेरे साथ (अङ्गिरसः) बुद्धिमानों ने (लोकम्) देखने योग्य परमात्मा को (प्र) अच्छे प्रकार (अजानन्) जाना है। (तम्) उस (पुण्यम्) पवित्र (लोकम्) देखने योग्य परमात्मा को (प्र ज्ञेषम्) मैं अच्छे प्रकार जानूँ ॥१६॥
भावार्थभाषाः - ज्ञानी पुरुषों ने जीवात्मा को ज्ञानी बनाकर परमात्मा को पाया है, इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य ज्ञानवान् होकर सर्वव्यापक परमेश्वर के दर्शन से आनन्दित होवे ॥१६॥ इस मन्त्र का अन्तिम पाद-यजु० २०।२५। में है ॥
टिप्पणी: १६−(अजः) गतिशीलः (असि) (अज) हे अजन्मन् जीवात्मन् (स्वर्गः) सुखप्रापकः (असि) (त्वया) (लोकम्) द्रष्टव्यं परमात्मानम् (अङ्गिरसः) अ० २।१२।४। ज्ञानिनः (प्र) (अजानन्) ज्ञातवन्तः (तम्) प्रसिद्धम् (लोकम्) दर्शनीयमीश्वरम् (पुण्यम्) पवित्रम् (प्र) (ज्ञेषम्) सिब् बहुलं लेटि। पा० ३।१।३४। जानातेर्लेटि। सिपीटि च रूपम्। जानीयाम् ॥
