ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अज) हे जीवात्मा ! (त्वा) तुझको (एताः) ये सब (सोम्याः) अमृतमय, (देवीः) उत्तम गुणवाली, (घृतपृष्ठाः) प्रकाश [वा सार तत्त्व] से सींचनेवाली, (मधुश्चुतः) मधुरपन बरसानेवाली (धाराः) धारण शक्तियाँ (उप) आदर से (यन्तु) प्राप्त हों। (सप्तरश्मौ) व्याप्त किरणोंवाले, यद्वा, सात प्रकार की [शुक्ल, नील, पील, रक्त, हरित, कपिश और चित्र] किरणोंवाले सूर्य [पूर्ण प्रकाश] में (नाकस्य) सुख के (पृष्ठे) पीठ [आश्रय] में (अधि) अधिकारपूर्वक (पृथिवीम्) पृथिवी (उत) और (द्याम्) अन्तरिक्षलोक को (स्तभान) सहारा दे ॥१५॥
भावार्थभाषाः - उद्योगी पुरुष अनेक प्रकार से धारण शक्तियाँ प्राप्त करके सूर्य के समान ज्ञान में प्रकाशित होकर आनन्दपूर्वक संसार भर का उपकार करते हैं ॥१५॥ निरुक्त ४।२६। में कहा है−“सात फैली हुई संख्या है, सात सूर्य की किरणें हैं, और निरुक्त ४।२७। में वर्णन है−“सप्तनामा सूर्य है, सात किरणें इसकी ओर रसों को झुकाती हैं, अथवा सात ऋषि [इन्द्रियाँ] इसकी स्तुति करते हैं ॥