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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उपपर्चन) हे समीप सम्बन्धवाले [परमेश्वर !] (इह) यहाँ पर (अस्मिन्) इस (गोष्ठे) वाणियों के स्थान में (नः) हमें (उप उप) अत्यन्त समीप से (पृञ्च) मिल। (इन्द्रः) हे परमैश्वर्यवाले परमात्मा ! (ऋषभस्य तव) तुझ श्रेष्ठ का (यत्) जो (रेतः) पराक्रम और (वीर्यम्) वीरत्व है, [उसके साथ] (उप उप) अति समीप से [मिल] ॥२३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर से घनिष्ठ सम्बन्ध करके अपना बल पराक्रम बढ़ावे ॥२३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० ६ सू० २८ म० ८ ॥
टिप्पणी: २३−(उप उप) अति समीपम् (इह) अत्र (उपपर्चन) पृची संपर्के-ल्यु। हे समीपसम्बन्धिन् (अस्मिन्) (गोष्ठे) वाचां स्थाने (पृञ्च) संयोजय (नः) अस्मान् (उप) (ऋषभस्य) श्रेष्ठस्य (यत्) (रेतः) पराक्रमः (उप) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (तव) (वीर्यम्) वीरत्वं बलम् ॥
