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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [परमेश्वर की] (गुदाः) गुदा की नाड़ियाँ (सिनीवाल्याः) चौदस के साथ मिली हुई अमावस की (आसन्) थीं, [उसकी] (त्वचम्) त्वचा को (सूर्यायाः) सूर्य की धूप का (अब्रुवन्) उन्होंने बतलाया। (पदः) [उसके] पैरों को (उत्थातुः) उठनेवाले [उत्साही पुरुष] का (अब्रुवन्) उन्होंने बतलाया, (यत्) जब (ऋषभम्) सर्वव्यापक परमेश्वर को (अकल्पयन्) उन्होंने कल्पना से माना ॥१४॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर अन्धकार और प्रकाश का जतानेवाला और पुरुषार्थियों को चलानेवाला है, ऐसा विद्वान् लोग समझते हैं [चौदस के साथ मिली अमावस में प्रकाश थोड़ा और अन्धकार अधिक होता है] ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाड्यः (आसन्) (सिनीवाल्याः) अ० २।२६।२। सिन्या शुक्लया चन्द्रकलया वल्यते मिश्र्यते या सा सिनीवाली। सिनी+वल मिश्रणे-घञ्, ङीष्। चतुर्दशीयुक्ताया अमावास्यायाः। सिनीवाली कुहुरिति देवपत्न्याविति नैरुक्ता अमावास्ये इति याज्ञिका या पूर्वामावस्या सा सिनीवाली योत्तरा सा कुहूरिति विज्ञायते-निरु० ११।३१। सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा नष्टेन्दुकला कुहूः-इत्यमरः ४।९। (सूर्यायाः) राजसूयसूर्य०। पा० ३।१।११४। सृ गतौ यद्वा षू प्रेरणे निपातनात् क्यपि रूपसिद्धिः, टाप्। सूर्या वाङ्नाम-निघ०। १।११। पदनाम-निघ० ५।६। सूर्या सूर्यस्य पत्नी-निरु० १२।७। सूर्यदीप्तेः (अब्रुवन्) अकथयन् (उत्थातुः) उत्थानशीलस्य। उत्साहिनः पुरुषस्य (पदः) पद गतौ-क्विप्। पादान् (ऋषभम्) म० १। सर्वव्यापकं परमेश्वरम् (यत्) यदा (अकल्पयन्) अ० ६।१०९।१। कल्पितवन्तः। कल्पनया ज्ञातवन्तः ॥
