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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भसत्) [परमेश्वर की] पेड़ू (आदित्यानाम्) अनेक सूर्यलोकों की (आसीत्) थी, [उसके] (श्रोणी) दोनों कूल्हे (बृहस्पतेः) बृहस्पति लोक के (आस्ताम्) थे। [उसकी] (पुच्छम्) पूँछ (देवस्य) गतिमान् (वातस्य) वायु की [थी], (तेन) उससे (ओषधीः) ओषधियों को (धूनोति) वह हिलाता है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमेश्वर को पूँछवाले पक्षी पशु आदि के समान माना है। उस परमेश्वर में अनन्त सूर्य और बृहस्पति आदि लोक और वायुमण्डल रह कर उसी की शक्ति से चलते हैं ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(भसत्) अ० ४।१४।८। नाभितलभागः (आसीत्) (आदित्यानाम्) सूर्याणाम् (श्रोणी) अ० २।३३।५। नितम्बौ (आस्ताम्) (बृहस्पतेः) बृहस्पतिलोकस्य (पुच्छम्) अ० ७।५६।६। लाङ्गूलम् (वातस्य) पवनस्य (देवस्य) गतिमतः (तेन) (पुच्छेन) (धूनोति) कम्पयति (ओषधीः) अन्नादिपदार्थान् ॥
