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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र इव) बड़े ऐश्वर्यवान् पुरुष के समान (देवेषु) विद्वानों के बीच, (यः) जो [परमेश्वर] (विवावदत्) अनेक प्रकार बोलता हुआ (गोषु) भूमि आदि लोकों में (एति) चलता है, (तस्य) उस (ऋषभस्य) सर्वव्यापक के (अङ्गानि) अङ्गों को (ब्रह्मा) ब्रह्मा [चारों वेद जाननेवाला विद्वान्] (भद्रया) कल्याणी रीति से (सम्) भले प्रकार (स्तौतु) सत्कार से वर्णन करे ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो परमेश्वर वेद द्वारा अनेक नियमों का उपदेश करता हुआ सर्वलोकनियन्ता है, विद्वान् पुरुष उसके गुणों की महिमा को यथावत् जाने ॥११॥
टिप्पणी: ११−(यः) ऋषभः। परमेश्वरः (इन्द्रः) प्रतापी मनुष्यः (देवेषु) विद्वत्सु (गोषु) गौः पृथिवी-निघ० १।१। पृथिव्यादिलोकेषु (एति) गच्छति। व्याप्नोति (विवावदत्) वि+वद व्यक्तायां वाचि यङ्लुकि-शतृ। अनेकप्रकारेण प्रवदन् सन् (तस्य) (ऋषभस्य) म० १। सर्वव्यापकस्य (अङ्गानि) गुणावयवान् (ब्रह्मा) चतुर्वेदज्ञो विद्वान् (सम्) सम्यक् (स्तौतु) अर्चतु-निघ० ३।१४। (भद्रया) कल्याण्या रीत्या ॥
