0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (विषुवति) व्याप्तिवाले [ऊँचे] स्थान पर (विततम्) फैले हुए, (सहस्राक्षम्) सहस्रों व्यवहार वा झरोखेवाले (ओपशम्) उपयोगी, (ब्रह्मणा) वेदज्ञ विद्वान् करके (अवनद्धम्) अच्छे प्रकार छाये गये और (अभिहितम्) बताये गये (अक्षुम्) व्याप्तिवाले [सर्वदर्शक स्तम्भगृह] को (विचृतामसि) हम अच्छे प्रकार ग्रन्थित करते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग विद्वान् शिल्पियों की सम्मति से ऊँचे स्थान पर सर्वदर्शक स्तम्भ, अर्थात्, ज्योतिष चक्र, प्रकाश लाट, घटिकाधान आदि सर्वोपयोगी स्थान बनावें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(अक्षुम्) अक्षू व्याप्तौ संघाते च-उ। व्याप्तं सर्वदर्शकं स्तम्भगृहम् (ओपशम्) आ+उप+शीङ् स्वप्ने-ड। अर्शआद्यच्। बहूपशयम्। सर्वोपयोगिनम् (विततम्) विस्तृतम् (सहस्राक्षम्) सहस्राणि व्यवहारा गवाक्षा वा यस्मिन् तम् (विषुवति) विष्लृ व्याप्तौ-कु, मतुप्। व्याप्तिमति। उच्चस्थाने (अवनद्धम्) आच्छादिनम् (अभिहितम्) कथितम्। विज्ञापितम् (ब्रह्मणा) वेदज्ञेन विप्रेण शिल्पिना (वि चृतामसि) विशेषेण ग्रन्थयामः ॥
