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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (देवि) हे दिव्य कमनीय (शाले) शाला ! तू (हविर्धानम्) देने लेने योग्य पदार्थों [वा अन्न और हवन सामग्री] का घर, (अग्निशालम्) अग्नि [वा बिजुली आदि] का स्थान, (पत्नीनाम्) रक्षा करनेवाली स्त्रियों का (सदनम्) घर और (सदः) सभास्थान और (देवानाम्) विद्वान् पुरुषों का (सदः) सभास्थान (असि) है ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को ऐसे घर बनाने चाहिये, जो कला-कौशल आदि कर्मों, कुटुम्बियों के रहने, स्त्री-सम्मेलन और पुरुष-सभा करने में सुखदायी हों ॥७॥
टिप्पणी: ७−(हविर्धानम्) हविषां दातव्यादातव्यपदार्थानामन्नहवनवस्तूनां च स्थानम् (अग्निशालम्) पावकस्य विद्युतो वा गृहम् (पत्नीनाम्) रक्षणस्वभावानां स्त्रीणाम् (सदनम्) गृहम् (सदः) सभास्थानम् (देवानाम्) विदुषां पुरुषाणाम् (असि) (देवि) हे दिव्ये, कमनीये (शाले) गृह ॥
