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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (विश्ववारे) हे सब उत्तम पदार्थोंवाली ! (ते) तेरे (वंशानाम्) बाँसों, (नहनानाम्) गाँठों (च) और (प्राणाहस्य) बन्धन की (तृणस्य) घास के और (ते) तेरे (पक्षाणाम्) पक्खों [भीति आदि] के (नद्धानि) बन्धनों को (वि) अच्छे प्रकार (चृतामसि) हम गूँथते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य घर बनाने में सब अङ्गों के जोड़ों को यथावत् दृढ़ करें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(वंशानाम्) वश कान्तौ-अच् घञ् वा, नुम् च। वेणूनाम् (ते) तव (नहनानाम्) ग्रन्थीनाम् (प्राणाहस्य) प्र+आङ्+णह बन्धने-घञ्। बन्धनसाधनस्य (तृणस्य) (च) (पक्षाणाम्) पक्ष परिग्रहे-अच्। गृहपार्श्वानाम् (विश्ववारे) हे सर्ववरणीयपदार्थयुक्ते। अन्यत् पूर्ववत् ॥
