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आ य॑याम॒ सं ब॑बर्ह ग्र॒न्थींश्च॑कार ते दृ॒ढान्। परूं॑षि वि॒द्वाञ्छस्ते॒वेन्द्रे॑ण॒ वि चृ॑तामसि ॥
पद पाठ
आ । ययाम । सम् । बबर्ह । ग्रन्थीन् । चकार । ते । दृढान् । परूंषि । विद्वान् । शस्ताऽइव । इन्द्रेण । वि ।चृतामसि ॥३.३॥
अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:3
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - उस [शिल्पी] ने (ते) तेरी (ग्रन्थीन्) गाँठों को (आ ययाम) फैलाया है, (सम् बबर्ह) मिलाया है और (दृढान्) दृढ़ (चकार) किया है। (परूँषि) जोड़ों को (विद्वान्) विद्वान् (शस्ता इव) चीड़-फाड़ करनेवाले [वैद्य] के समान हम लोग (इन्द्रेण) ऐश्वर्य के साथ (वि) विशेष करके (चृतामसि) बाँधते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - शिल्पी लोग सब आवश्यक सामग्री एकत्र करके घरों को दृढ़ बनावें, जिस प्रकार वैद्य टूटे अवयवों को जोड़ कर दृढ़ बनाता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(आ ययाम) यमु उपरमे। विस्तारितवान् (सम् बबर्ह) बृह वृद्धौ संवर्द्धितवान्। संयोजितवान् (ग्रन्थीन्) सन्धीन् (चकार) कृतवान् (ते) तव (दृढान्) कठिनान् (परूँषि) अवयवान् (विद्वान्) पण्डितः (शस्ता) शसु हिंसायाम्−तृन्। रुग्णाङ्गानां छेत्ता वैद्यः (इव) यथा (इन्द्रेण) ऐश्वर्येण (वि) विशेषेण (चृतामसि) दृढीकुर्मः ॥
