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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राच्याः दिशः) पूर्व दिशा से (शालायाः) शाला की (महिम्ने) महिमा के लिये (नमः) अन्न हो, (स्वाह्येभ्यः) सुवाणी के योग्य (देवेभ्यः) कमनीय विद्वानों के लिये (स्वाहा) सुवाणी [वेदवाणी] हो ॥२५॥ मन्त्र २५ से ३१ तक स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में आये हैं ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि पूर्वादि सब दिशाओं से पुष्कल अन्न आदि पदार्थ संग्रह करके शाला में रक्खें, जिस में विद्वान् लोग वेदों का विचार करते रहें ॥२५-३१॥
टिप्पणी: २५−(प्राच्याः) अ० ३।२६।१। पूर्वाया सकाशात् (दिशः) दिशायाः (शालायाः) गृहस्य (नमः) अन्नम्-निघ० २।७। (महिम्ने) महत्त्वाय (स्वाहा) अ० २।१६।१। सुवाणी। वेदवाणी (देवेभ्यः) कमनीयेभ्यो विद्वद्भ्यः (स्वाह्येभ्यः) तदर्हति। पा० ५।१।६३। स्वाहा-यत्। सुवाणीयोगेभ्यः ॥
