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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (शाले) हे शाला ! तू (नः) हमारे लिये [अपने] (पाशम्) बन्धन को (मा प्रति मुचः) मत कभी छोड़, (गुरुः) भारी (भारः) बोझ तू (लघुः) हलका (भव) हो जा, (वधूम् इव) वधू के समान (त्वा) तुझको (यत्रकामम्) जहाँ कामना हो, वहाँ (भरामसि) हम पुष्ट करते हैं ॥२४॥
भावार्थभाषाः - शिल्पी लोग शाला के जोड़ों को सुदृढ़ मिलावें, और अच्छे प्रकार लम्बी चौड़ी बनाकर सुखदायिनी करें, और कुलवधू के समान आवश्यकीय पदार्थों से उसको परिपूर्ण करें ॥२४॥ यह मन्त्र स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: २४−(नः) अस्मभ्यम् (पाशम्) शालाबन्धनम् (मा प्रति मुचः) मा कदापि त्यज (गुरुः) गॄ शब्दे विज्ञापने-उ, उच्च। गुरुत्ववान् (भारः) गुरुत्ववान् पदार्थः (लघुः) लाघवगुणान्वितः। मनोहरः (भव) (वधूम्) नवोढां भार्याम् (इव) यथा (त्वा) (शाले) (यत्रकामम्) यत्र कामना भवेत् तत्र (भरामसि) पोषयामः। दृढीकुर्मः ॥
