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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (शाले) हे शाला ! (प्रतीचीनः) [तेरे] सन्मुख चलता हुआ मैं (प्रतीचीम्) [मेरे] सन्मुख होती हुई, (अहिंसतीम्) न पीड़ा देती हुई (त्वा) तुझको (प्र एमि) अच्छे प्रकार प्राप्त होता हूँ। (हि) निश्चय करके (अन्तः) [तेरे] भीतर (अग्निः) अग्नि [का घर] और (आपः) जल [का स्थान] (च) और (ऋतस्य) सत्य [के ध्यान] का (प्रथमा) पहिला (द्वाः) द्वार है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जिस शाला में शिल्प आदि यज्ञों के लिये कार्यालय और सत्य-असत्य विचारने के लिये वेदपठन-स्थान होता है, वहाँ मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक आते-जाते हैं ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(प्रतीचीम्) अ० १।२८।२। प्रत्यक्षं गच्छन्तीम् (त्वा) शालाम् (प्रतीचीनः) अ० ४।३२।६। प्रत्यक्षं गच्छन् (अहिंसतीम्) अपीडयन्तीम् (अग्निः) अग्निस्थानम् (हि) निश्चयेन (अन्तः) मध्ये (आपः) जलस्थानम् (च) (ऋतस्य) सत्यस्य। वेदस्य (प्रथमा) मुख्या (द्वाः) द्वृ संवरणे-णिच्-विच्। द्वारम् ॥
