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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - [जैसे] (कुलाये अधि) घोंसले पर (कुलायम्) घोंसला और (कोशे) कोश [निधि] पर (कोशः) कोश [धनसंचय] (समुब्जितः) यथावत् दबा होता है, [वैसे ही] (तत्र) वहाँ [शाला में] (मर्तः) मनुष्य (वि जायते) विविध प्रकार प्रकट होता है, (यस्मात्) जिस [कारण] से (विश्वम्) सब [सन्तानसमूह] (प्रजायते) उत्तमता से उत्पन्न होता है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसलों में और अनेक धन धनों के द्वारा बढ़ते हैं, वैसे ही मनुष्य सुखप्रद घर में नीरोग रहकर उत्तम सन्तानों से उन्नति करते हैं ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(कुलाये) नीडे (अधि) (कुलायम्) कुलानां पक्षिसमूहानामयो वासस्थानम् (कोशे) धनसंचये (कोशः) निधिः (समुब्जितः) संवृतः (तत्र) शालायाम् (मर्तः) मनुष्यः (वि) विविधम् (जायते) प्रादुर्भवति (यस्मात्) कारणात् (विश्वम्) सर्वमपत्यजातम् (प्रजायते) प्रकर्षेणोत्पद्यते ॥
