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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - [हे शाला !] (ते) तेरे (इटस्य) द्वार के (अपिनद्धम्) बन्धन को (अपोर्णुवन्) खोलता हुआ मैं (वि चृतामि) अच्छे प्रकार ग्रन्थित करता हूँ। (वरुणेन) ढकनेवाले अन्धकार से (समुब्जिताम्) दबाई हुई [तुझ] को (मित्रः) सर्वप्रेरक सूर्य (प्रातः) प्रातःकाल (वि उब्जतु) खोल देवे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य घर के द्वारों में शृङ्खला चटकनी आदि ऐसी लगावें, जिससे अन्धकार के समय बन्द करने और प्रकाश के समय खोलने में सुभीता हो ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(इटस्य) इट् गतौ-क। गमनागमनस्थानस्य द्वारस्य (ते) तव (वि चृतामि) विशेषेण ग्रन्थयामि (अपिनद्धम्) बन्धनम् (अपोर्णुवन्) विवृण्वन् (वरुणेन) आवरकेण तमसा (समुब्जिताम्) संवृतां त्वाम् (मित्रः) सर्वप्रेरकः सूर्यः (प्रातः) प्रभाते (वि उब्जतु) विवृणोतु ॥
