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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (गोभ्यः) गौओं के लिये, (अश्वेभ्यः) घोड़ों के लिये और (यत्) जो कुछ (शालायाम्) शाला में (विजायते) उत्पन्न होवे, [उसके लिये] (नमः) अन्न [होवे]। (विजावति) हे विविध उत्पन्न पदार्थोंवाली ! और (प्रजावति) हे उत्पन्न प्रजाओंवाली ! (ते) तेरे (पाशान्) बन्धनों को (विचृतामसि) हम अच्छे प्रकार ग्रन्थित करते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को विविध पोषणसामग्री सुदृढ़ घरों में रखनी उचित है ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(गोभ्यः) गवां रक्षणाय (अश्वेभ्यः) अश्वानां पोषणाय (नमः) अन्नम् (यत्) अपत्यजातम् (शालायाम्) गृहे (विजायते) विविधमुत्पद्यते (विजावति) हे विविधोत्पन्नपदार्थयुक्ते (प्रजावति) हे श्रेष्ठप्रजाविशिष्टे (ते) तव (पाशान्) निर्माणबन्धान् (विचृतामसि) ॥
