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नम॒स्तस्मै॒ नमो॑ दा॒त्रे शाला॑पतये च कृण्मः। नमो॒ऽग्नये॑ प्र॒चर॑ते॒ पुरु॑षाय च ते॒ नमः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नम: । तस्मै । नम: । दात्रे । शालाऽपतये । च । कृण्म: । नम: । अग्नये । प्रऽचरते । पुरुषाय । च । ते । नम: ॥३.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:12


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मै) उस (नमो दात्रे) अन्न देनेवाले (च) और (शालापतये) शाला के स्वामी को (नमः) सत्कार (कृण्मः) हम करते हैं। (अग्नये) अग्नि [की सिद्धि] को (नमः) अन्न (च) और (प्रचरते) सेवा करनेवाले (पुरुषाय) पुरुष के लिये (ते) तेरे हित के लिये (नमः) अन्न होवे ॥१—२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अन्न आदि के दाता गृहस्थों का आदर करते रहें और यज्ञ आदि के करने और पुरुषों के पोषण के लिये घर में अन्न आदि पदार्थ उपस्थित रहें ॥१—२॥
टिप्पणी: १२−(नमः) सत्कारम् (तस्मै) (नमः) अन्नम्-निघ० २।७। (दात्रे) ददातेस्तृन्। दत्तवते (शालापतये) गृहस्वामिने (च) (कृण्मः) कुर्मः (नमः) अन्नम् (अग्नये) यज्ञादिष्वग्निसिद्धये (प्रचरते) सेवमानाय (च) (ते) तुभ्यम् ॥