0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]
पदार्थान्वयभाषाः - (शाले) हे शाला ! (यः) जिस [गृहस्थ] ने (त्वा) तुझे (निमिमाय) जमाया है और (वनस्पतीन्) सेवन करनेवालों के रक्षक पदार्थों को (संजभार) एकत्र किया है। (शाले) हे शाला ! (परमेष्ठी) सबसे उच्च पद पर रहनेवाले (प्रजापतिः) उस प्रजापालक [गृहस्थ] ने (प्रजायै) प्रजा के सुख के लिये (त्वा) तुझे (चक्रे) बनाया है ॥११॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ऐसी शाला बनावें, जिसमें आप और सन्तान आदि सब सुखी रहें ॥११॥
टिप्पणी: ११−(यः) (त्वा) (शाले) (निमिमाय) डुमिञ् प्रक्षेपणे-लिट्। मूलेन दृढीकृतवान् (संजभार) संजहार। संगृहीतवान् (वनस्पतीन्) अ० १।३५।३। सेवनशीलानां मनुष्याणां रक्षकपदार्थान् (प्रजायै) सन्तानादिहिताय (चक्रे) कृतवान् (परमेष्ठी) अ० १।७।२। उच्चपदस्थः (प्रजापतिः) प्रजापालको गृहस्थः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
