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यस्त्वा॑ शाले निमि॒माय॑ संज॒भार॒ वन॒स्पती॑न्। प्र॒जायै॑ चक्रे त्वा शाले परमे॒ष्ठी प्र॒जाप॑तिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । त्वा । शाले । निऽमिमाय । सम्ऽजभार । वनस्पतीन् । प्रऽजायै । चक्रे । त्वा । शाले । परमेऽस्थी । प्रजाऽपति: ॥३.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

पदार्थान्वयभाषाः - (शाले) हे शाला ! (यः) जिस [गृहस्थ] ने (त्वा) तुझे (निमिमाय) जमाया है और (वनस्पतीन्) सेवन करनेवालों के रक्षक पदार्थों को (संजभार) एकत्र किया है। (शाले) हे शाला ! (परमेष्ठी) सबसे उच्च पद पर रहनेवाले (प्रजापतिः) उस प्रजापालक [गृहस्थ] ने (प्रजायै) प्रजा के सुख के लिये (त्वा) तुझे (चक्रे) बनाया है ॥१—१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ऐसी शाला बनावें, जिसमें आप और सन्तान आदि सब सुखी रहें ॥१—१॥
टिप्पणी: १—१−(यः) (त्वा) (शाले) (निमिमाय) डुमिञ् प्रक्षेपणे-लिट्। मूलेन दृढीकृतवान् (संजभार) संजहार। संगृहीतवान् (वनस्पतीन्) अ० १।३५।३। सेवनशीलानां मनुष्याणां रक्षकपदार्थान् (प्रजायै) सन्तानादिहिताय (चक्रे) कृतवान् (परमेष्ठी) अ० १।७।२। उच्चपदस्थः (प्रजापतिः) प्रजापालको गृहस्थः। अन्यत् पूर्ववत् ॥