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उप॒मितां॑ प्रति॒मिता॒मथो॑ परि॒मिता॑मु॒त। शाला॑या वि॒श्ववा॑राया न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उपऽमिताम् । प्रतिऽमिताम् । अथो इति । परिऽमिताम् । उत । शालाया: । विश्वऽवाराया: । नध्दानि । वि । चृतामसि ॥ ३.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्ववारायाः) सब ओर द्वारोंवाली वा सब श्रेष्ठ पदार्थोंवाली (शालायाः) शाला की (उपमिताम्) उपमायुक्त [देखने में सराहने योग्य], (प्रतिमिताम्) प्रतिमानयुक्त [जिसके आमने-सामने की भीतें, द्वार, खिड़की आदि एक नाप में हों] (अथो) और भी (परिमिताम्) परिमाणयुक्त [चारों ओर से नाप कर सम चौरस की हुई] [बनावट] को (उत) और (नद्धानि) बन्धनों [चिनाई, काष्ठ आदि के मेलों] को (वि चृतामसि) हम अच्छे प्रकार ग्रन्थित [बन्धनयुक्त] करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि विचारपूर्वक प्रतिकृति अर्थात् चित्र बनाकर घरों को उत्तम सामग्री से भले प्रकार सुथरे, सुडौल, सुदृश्य, दिखनौत, और चित्तविनोदक बनावें ॥१॥ यह मन्त्र स्वामीदयानन्दकृत संस्कारविधि-गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥ इस सूक्त के संस्कारविधि में आये सब मन्त्रों का अर्थ प्रशंसित महात्मा के आधार पर किया गया है ॥
टिप्पणी: १−(उपमिताम्) माङ् माने-क्त। द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति। पा० ७।४।४०। आकारस्य इकारः। उपमायुक्ताम् प्रशंसायुक्ताम् (प्रतिमिताम्) माङ्-क्त। प्रतिमानयुक्ताम्। मानप्रतिमानेन सदृशीकृताम् (अथो) अपि च (परिमिताम्) माङ्-क्त। कृतपरिमाणाम्। सर्वतो मानेन समीकृताम्। रचनामिति शेषः (उत) अपि च (शालायाः) अ० ३।१२।१। गृहस्य (विश्ववारायाः) अ० ७।२०।४। वृञ् वरणे-घञ्। विश्वतो वारा द्वाराणि यस्यां तस्याः। सर्वे वाराः श्रेष्ठपदार्थाः यस्यां तस्याः। (नद्धानि) णह बन्धने-क्त। बन्धनानि (वि) विशेषेण (चृतामसि) चृती हिंसाग्रन्थनयोः। ग्रन्थयामः। बध्नीमः। दृढीकुर्मः ॥