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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) वे (अधराञ्चः) अधोगतिवाले लोग (बन्धनात्) बन्धन से (छिन्ना) छूटी हुई (नौः इव) नाव के समान (प्र प्लवन्ताम्) बहते चले जावें। (सायकप्रणुत्तानाम्) तीर से ढकेले गये पदार्थों का (निवर्तनम्) लौटना (पुनः) फिर (न) नहीं (अस्ति) होता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य दृढ़ उपायों से विघ्नों को हटाते हैं, वे सहज में सदा निर्विघ्न रहते हैं ॥१२॥ यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है-अ० ३।६।७ ॥
टिप्पणी: १२−(सायकप्रणुत्तानाम्) बाणैः प्रेरितानाम्। अन्यद् व्याख्यातम् अ० ३।६।७ ॥
