जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निम्) अग्नि [सर्वव्यापक परमेश्वर] को (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला] (मित्रम्) मित्र, (वरुणम्) वरुण [श्रेष्ठ] (आहुः) वे [तत्त्वज्ञानी] कहते हैं, (अथो) और (सः) वह (दिव्यः) प्रकाशमय (सुपर्णः) सुन्दर पालन सामर्थ्यवाला (गरुत्मान्) स्तुतिवाला [गुरु आत्मा महान् आत्मा] है (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (एकम्) एक (सत्) सत्तावाले [ब्रह्म] को (बहुधा) बहुत प्रकारों से (वदन्ति) कहते हैं, (अग्निम्) उसी अग्नि [सर्वव्यापक परमात्मा] को (यमम्) नियन्ता और (मातरिश्वानम्) आकाश में श्वास लेता हुआ [अर्थात् आकाश में व्यापक] (आहुः) वे बताते हैं ॥२८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग परमात्मा के अनेक नामों से उसके गुण कर्म स्वभाव को जानकर और उसकी उपासना करके संसार में उन्नति करें ॥२८॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।१६४।४६। और निरुक्त ७।१८ ॥ इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ इत्येकविंशः प्रपाठकः ॥ इति नवमं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाड़ाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमासपरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये नवमं काण्डं समाप्तम् ॥