जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वाक्=वाचः) वाणी के (चत्वारि) चार [परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप] (परिमिता) परिमाणयुक्त (पदानि) जानने योग्य पद हैं, (तानि) उनको (ब्राह्मणाः) वे ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञानी] (विदुः) जानते हैं (ये) जो (मनीषिणः) मननशील हैं। (गुहा) गुहा [गुप्त स्थान] में (निहिता) रक्खे हुए (त्रीणि) तीन [परा, पश्यन्ती और मध्यमा रूप पद] (न) नहीं (ईङ्गयन्ति) चलते [निकलते] हैं, (मनुष्याः) मनुष्य [साधारण लोग] (वाचः) वाणी के (तुरीयम्) चौथे [वैखरी रूप पद] को (वदन्ति) बोलते हैं ॥२७॥
भावार्थभाषाः - वाणी की चार अवस्थाएँ हैं−परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। १−नादरूपा मूल आधार नाभि से निकलती हुई परा वाक् है, २−वही हृदय में पहुँचती हुई पश्यन्ती वाक् है, ३−वही बुद्धि में पहुँचकर उच्चारण से पहिले मध्यमा वाक् है, इन तीनों को योगी ही समझते हैं, और ४−मुख में ठहरकर तालु ओष्ठ आदि के व्यापार से बाहिर निकली हुई वैखरी वाक् है, जिस को सब साधारण मनुष्य समझते हैं। विद्वान् लोग अवधारण शक्ति बढ़ाकर प्राणियों के भीतरी भावों को जानकर आनन्द पावें ॥२७॥ पदपाठ में (ईङ्गयन्ति) के स्थान पर [इङ्गयन्ति] है−ऋक्० १।१६४।४५। तथा निरुक्−१३।९ ॥