जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्रयः) तीन (केशिनः) प्रकाशवाले [अपने गुण जतानेवाले, अग्नि, सूर्य और वायु] (ऋतुथा) ऋतु के अनुसार (संवत्सरे) संवत्सर [वर्ष] में (वि) विविध प्रकार (चक्षते) दीखते हैं, (एषाम्) इन में से (एकः) एक (अग्नि, ओषधियों को) (वपते) उपजाता है। (अन्यः) दूसरा [सूर्य] (शचीभिः) अपने कर्मों [प्रकाश, वृष्टि आदि] से (विश्वम्) संसार को (अभिचष्टे) देखता रहता है, (एकस्य) एक [वायु] की (ध्राजिः) गति (ददृशे) देखी गई है और (रूपम्) रूप (न) नहीं ॥२६॥
भावार्थभाषाः - पार्थिवाग्नि, सूर्य और वायु आदि पदार्थों के गुण और उपकारों से परमेश्वर की अद्भुत महिमा का अनुभव करके सब मनुष्य उसकी उपासना में तत्पर रहें ॥२६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१६४।४४। तथा निरुक्त−१२।२७ ॥