जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पद्वतीनाम्) प्रशंसित विभागोंवाली क्रियाओं में (प्रथमा) पहिली (अपात्) विना विभागवाली [सब के लिये एकरस वेदविद्या] (एति) चली आती है, (मित्रावरुणा) दोनों मित्रवरो ! [अध्यापक और शिष्य] (वाम्) तुम दोनों में (कः) किसने (तत्) उस [ज्ञान] को (आ) भले प्रकार (चिकेत) जाना है। (गर्भः) ग्रहण करनेवाला पुरुष (चित्) ही (अस्याः) इस [वेदविद्या] के (भारम्) पोषण गुण को (आ) अच्छे प्रकार (भरति) धारण करता है, (सत्यम्) सत्य व्यवहार को (पिपर्ति) पूर्ण करता है और (अनृतम्) मिथ्या कर्म को (नि) नीचे (पाति) रखता है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - आचार्य और ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथावत् समझकर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करके संसार में उन्नति करें ॥२३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१५२।३। मन्त्र का अर्थ सहर्ष महर्षिदयानन्द-भाष्य के आधार पर किया है ॥