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कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति। तं आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यूदुः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कृष्णम् । निऽयानम् । हरय: । सुऽपर्णा: । अप: । वसाना: । दिवम् । उत् । पतन्ति । ते । आ । अववृत्रन् । सदनात् । ऋतस्य । आत् । इत् । घृतेन । पृथिवीम् । वि । ऊदु: ॥१५.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हरयः) रस खींचनेवाली, (सुपर्णाः) अच्छा उड़नेवाली किरणें (अपः) जल को (वसानाः) ओढ़कर (कृष्णम्) खींचनेवाले, (नियानम्) नित्य गमनस्थान अन्तरिक्ष में होकर (दिवम्) प्रकाशमय सूर्यमण्डल को (उत् पतन्ति) चढ़ जाती हैं। (ते) वे (इत्) ही (आत्) फिर (ऋतस्य) जल के (सदनात्) घर [सूर्य] से (आ अववृत्रन्) लौट आती हैं, और उन्होंने (घृतेन) जल से (पृथिवीम्) पृथिवी को (वि) विविध प्रकार से (ऊदुः) सींच दिया है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य की किरणें पवन द्वारा भूमि से जल खींचकर और फिर बरसा कर उपकार करती हैं, वैसे ही मनुष्य विद्या प्राप्त करके संसार का उपकार करें ॥२२॥ यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-अ० ६।२२।१ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० १।—१६४।४७। और निरुक्त ७।२४। में भी ॥
टिप्पणी: २२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ६।२२।१ ॥