जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सलिलानि) बहुत ज्ञानों [अथवा समुद्रसमान अथाह कर्मों] को (तक्षती) करती हुई (गौः) ब्रह्मवाणी ने (इत्) ही (मिमाय) शब्द किया है, (सा) वह (एकपदी) एक [ब्रह्म] के साथ व्याप्तिवाली, (द्विपदी) दो [भूत भविष्यत्] में गतिवाली, (चतुष्पदी) चार [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] में अधिकारवाली, (अष्टापदी) [छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता, बड़ाई, ईश्वरपन, जितेन्द्रियता, और सत्य सङ्कल्प आठ ऐश्वर्य] आठ पद करानेवाली (नवपदी) नौ [मन बुद्धि सहित दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख] से प्राप्ति योग्य, (सहस्राक्षरा) सहस्रों [असंख्यात] पदार्थों में व्याप्तिवाली (बभूवुषी) होकर के (भुवनस्य) संसार की (पङ्क्तिः) फैलाव शक्ति है। (तस्याः) उस [ब्रह्मवाणी] से (समुद्राः) समुद्र [समुद्ररूप सब लोक] (अधि) अधिक-अधिक (वि) विविध प्रकार से (क्षरन्ति) बहते हैं ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जिस ब्रह्मवाणी, वेदविद्या से संसार के सब पदार्थ सिद्ध होते हैं और जिस की आराधना से योगी जन मुक्ति पाते हैं, वह वेदवाणी मनुष्यों को सदा सेवनीय है ॥२१॥ इस मन्त्र का मिलान करो-अ० ५।१९।७ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१६४।४१, ४२ तथा निरुक्त−११।४०, ४१ ॥