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सू॑यव॒साद्भग॑वती॒ हि भू॒या अधा॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम। अ॒द्धि तृण॑मघ्न्ये विश्व॒दानीं॒ पिब॑ शु॒द्धमु॑द॒कमा॒चर॑न्ती ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सुयवसऽअत् । भगऽवती । हि । भूया: । अध । वयम् । भगऽवन्त: । स्याम । अध्दि । तृणम् । अघ्न्ये । विश्वऽदानीम् । पिब । शुध्दम् । उदकम् । आऽचरन्ती ॥१५.२०॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:20


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्रजा, सब स्त्री-पुरुषो !] (सूयवसात्) सुन्दर अन्न आदि भोगनेवाली और (भगवती) बहुत ऐश्वर्यवाली (हि) ही (भूयाः) हो, (अध) फिर (वयम्) हम लोग (भगवन्तः) बड़े ऐश्वर्यवाले (स्याम) होवें। (अघ्न्ये) हे हिंसा न करनेवाली प्रजा ! (विश्वदानीम्) समस्त दानों की क्रिया का (आचरन्ती) आचरण करती हुई तू [हिंसा न करनेवाली गो के समान] (तृणम्) घास [अल्पमूल्य पदार्थ] को (अद्धि) खा और (शुद्धम्) शुद्ध (उदकम्) जल को (पिब) पी ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जैसे गौ अल्पमूल्य घास खाकर और शुद्ध जल पीकर दूध-घी आदि देकर उपकार करती है, वैसे ही मनुष्य थोड़े व्यय से शुद्ध आहार-विहार करके संसार का सदा उपकार करें ॥२०॥ यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-अ० ७।७३।११। और (अध) के स्थान पर ऋग्वेद में [अथो] है−१।१६४।४०। तथा नि–० ११।४४ ॥
टिप्पणी: २०-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ७।७३।११ ॥