जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्वधया) अपनी धारण शक्ति से (गृभीतः) ग्रहण किया हुआ (अमर्त्यः) अमरण स्वभाववाला [जीव] (मर्त्येन) मरण स्वभाववाले [शरीर] के साथ (सयोनिः) एकस्थानी होकर (अपाङ्) नीचे को जाता हुआ [वा] (प्राङ्) ऊपर को जाता हुआ (एति) चलता है। (ता) वे दोनों (शश्वन्ता) नित्य चलनेवाले, (विषूचीना) सब ओर चलनेवाले और (वियन्ता) दूर-दूर चलनेवाले हैं, [उन दोनों में से] (अन्यम् अन्यम्) एक-एक को (नि चिक्युः) [विवेकियों ने] निश्चय करके जाना है [और मूर्खों ने] (न) नहीं (न चिक्युः) निश्चय किया है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जीवात्मा अपने कर्मानुसार शरीर पाता और अधोगति वा उर्ध्वगति को प्राप्त होता है। जीवात्मा और शरीर के भेद को विद्वान् जानते हैं और मूर्ख नहीं जानते ॥१६॥ इस मन्त्र का मिलान ऊपर मन्त्र ८ से करो। यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।१६४।३८। तथा निरुक्त−१४।२३ ॥