जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह [प्रत्यक्ष] (वेदिः) वेदि [विद्यमानता का बिन्दु वा यज्ञभूमि] (पृथिव्याः) पृथिवी का (परः) परला (अन्तः) अन्त है, (अयम्) यह [प्रत्यक्ष] (सोमः) ऐश्वर्यवान् रस [सोम औषध वा अन्न आदि का अमृत रस] (वृष्णः) पराक्रमी (अश्वस्य) बलवान् पुरुष का (रेतः) वीर्य [पराक्रम] है। (अयम्) यह [प्रत्यक्ष] (यज्ञः) यज्ञ [परमाणुओं का संयोग-वियोग व्यवहार] (विश्वस्य) सब (भुवनस्य) संसार की (नाभिः) नाभि [नियम में बाँधनेवाली शक्ति] है, (अयम्) यह [प्रत्यक्ष] (ब्रह्मा) ब्रह्मा [चारों वेदों का प्रकाशक परमेश्वर] (वाचः) वाणी [विद्या] का (परमम्) उत्तम (व्योम) [विविध रक्षास्थान] अवकाश है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - १−पृथिवी गोल है, यदि मनुष्य किसी स्थान से सीधा बिना मुड़े किसी ओर चला जावे, तो वह चलते-चलते फिर वहीं आ पहुँचेगा, जहाँ से चला था। २-सब प्राणी सोम अर्थात् अन्न आदि के रस से बलवान् होते हैं। ३-परमाणुओं के संयोग-वियोग अर्थात् आकर्षण-अपकर्षण में सब संसार की नाभि अर्थात् स्थिति है। ४-परमेश्वर ही सब वाणियों अर्थात् विद्याओं का भण्डार है ॥१४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१६४।३५। तथा यजु० २३।६२। तथा महर्षि दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ १४७ में भी व्याख्यात है ॥