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द्यौर्नः॑ पि॒ता ज॑नि॒ता नाभि॒रत्र॒ बन्धु॑र्नो मा॒ता पृ॑थि॒वी म॒हीयम्। उ॑त्ता॒नयो॑श्च॒म्वो॒र्योनि॑र॒न्तरत्रा॑ पि॒ता दु॑हि॒तुर्गर्भ॒माधा॑त् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्यौ: । न: । पिता । जनिता । नाभि: । अत्र । बन्धु: । न: । माता । पृथिवी । मही । इयम् । उत्तानयो: । चम्वो: । योनि: । अन्त: । अत्र । पिता । दुहितु: । गर्भम्‌ । आ । अघात् ॥१५.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:12


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (द्यौः) प्रकाशमान सूर्य (नः) हमारा (पिता) पालनेवाला और (जनिता) उत्पन्न करनेवाला है, (अत्र) इस [सूर्य] में (नः) हमारी (नाभिः) नाभि [प्रकाश वा जलरूप उत्पत्ति का मूल] है, (इयम्) यह (मही) बड़ी (पृथिवी) पृथिवी (माता) और (बन्धुः) बन्धु [के तुल्य] है। (उत्तानयोः) उत्तमता से फैले हुए (चम्वोः) [दो सेनाओं के समान स्थित] सूर्य और पृथिवी के (अन्तः) बीच (योनिः) [जो] घर [अवकाश] है, (अत्र) इस [अवकाश] में (पिता) पालनेवाले [सूर्य वा मेघ] ने (दुहितुः) [रसों को खींचनेवाली] पृथिवी के (गर्भम्) उत्पत्तिसामर्थ्य [जल] को (आ) यथाविधि (अधात्) धारण किया है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की महिमा से सूर्य और भूमि सब प्राणियों के पिता, माता और बन्धु के समान हैं, उन दोनों के बीच अन्तरिक्ष में पृथिवी से किरणों द्वारा जल खिंच कर मेघमण्डल में रहता है, फिर वही जल पृथिवी पर बरस कर नाना पदार्थ उत्पन्न करता और प्राणियों को जीवनसाधन देता है, उस जगदीश्वर की उपासना सब मनुष्यों को सदा करनी चाहिये ॥१२॥ (नः, नः) के स्थान में [मे, मे] है−ऋग्वेद १।१६४।३३। तथा निरु० ४।२१ ॥
टिप्पणी: १२−(द्यौः) अ० २।१२।६। प्रकाशमानः सूर्यः (नः) अस्माकम् (पिता) पिता पालयिता-वा-निरु० ४।२१। (जनिता) जनयिता (नाभिः) अ० १।१३।३। नाभिः सन्नहनान्नाभ्या सन्नद्धा गर्भा जायन्त इत्याहुः-निरु० ४।२१। तुन्दकूपीचक्रं यथा (अत्र) सूर्ये (बन्धुः) सम्बन्धी (नः) (माता) जननी यथा (मही) अ० १।१७।२। महती (इयम्) (उत्तानयोः) अ० ९।९।१४। उत्तमतया विस्तृतयोः (चम्वोः) कृषिचमितनि०। उ० १।८०। चमु अदने−ऊ। चम्वौ द्यावापृथिव्यौ-निघ० ३।३०। चमन्त्यनयोः। द्यावापृथिव्योः। सेनयोरिव-दयानन्दभाष्ये (योनिः) गृहम्-निघ० ३।४। अवकाशः (अन्तः) मध्ये (अत्र) योनौ (पिता) पालकः सूर्यः पर्जन्यो वा (दुहितुः) अ–० ३।१०।१३। दुह प्रपूरणे−तृच्। दुहिता दुर्हिता दूरे हिता दोग्धेर्वा-निरु० ३।४। दोग्धि प्रपूरयतीति दुहिता। रसानां प्रपूरयित्र्याः। पृथिव्याः-निरु० ४।˜२१। दूरे निहिताया भूम्याः−इति सायणः (गर्भम्) सर्वोत्पादनसमर्थं वृष्ट्युदकलक्षणम्−इति सायणः। सर्वभूतगर्भोत्पत्तिहेतुभूतोदकम्−इति दुर्गाचार्यः-निरुक्तटीकायाम्−४।२१। वीर्यरूपं जलम् (आ) समन्तात् (अधात्) धृतवान् ॥