जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस [परमेश्वर] ने (ईम्) इस [प्राणी] को (चकार) बनाया है, (सः) वह [प्राणी] (अस्य) इस [परमेश्वर] को [यथावत्] (न) नहीं (वेद) जानता है, (यः) जिस [प्राणी] ने (ईम्) इस [परमेश्वर] को (ददर्श) देखा है, वह [परमेश्वर] (तस्मात्) उस [प्राणी] से (हिरुक्) गुप्त (इत् नु) अवश्य ही है। (मातुः) माता के (योना अन्तः) गर्भाशय के भीतर (परिवीतः) लपेटा हुआ [बालक जैसे] (सः) उस (बहुप्रजाः) अनेक प्रजाओंवाले [परमेश्वर] ने (निर्ऋतिः=०-तिम्) भूमि में (आ) सब प्रकार (विवेश) प्रवेश किया है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - कोई विवेकी प्राणी अनन्त सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की सीमा नहीं पा सकता है, यद्यपि वह ईश्वर प्रत्येक वस्तु के भीतर ऐसा स्थित है, जैसे माता के गर्भ में बालक होता है ॥१०॥ (निर्ऋतिः) के स्थान पर [निर्ऋतिम्] है−ऋ० १।१६४।३२ ॥