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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पृथिवी) पृथिवी [उस परमेश्वर का] (दण्डः) दण्ड [दमन स्थान, न्यायालयसमान], (अन्तरिक्षम्) मध्यलोक (गर्भः) गर्भ [आधारसमान], (द्यौः) आकाश (कशा) वाणी [समान], (विद्युत्) बिजुली (प्रकशः) प्रकृष्ट गति [समान] और (हिरण्ययः) तेजोमय [सूर्य] (बिन्दुः) बिन्दु [छोटे चिह्नसमान] है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी के सब प्राणियों की व्यवस्था और अनेक लोक-लोकान्तरों की रचना और परस्पर संबन्ध देखकर परमेश्वर की अनन्त महिमा प्रतीत होती है ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(दण्डः) ञमन्ताड् डः। उ० १।११४। दमु उपशमे-ड। दमनस्थानम्। न्यायालयो यथा (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकः (गर्भः) आधारः। मध्यदेशः (द्यौः) आकाशः (कशा) म० ५। वाणी (विद्युत्) अशनिः (प्रकशः) कश गतिशासनयोः शब्दे च-पचाद्यच्। प्रकृष्टा मतिः (हिरण्ययः) अ० ४।२।८। तेजोमयः सूर्यः (बिन्दुः) शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। विदि अवयवे-उ प्रत्ययः। अल्पांशः ॥
