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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शुभः) शुभ कर्म के (पती) पालन करनेवाले (अश्विना) हे चतुर माता-पिता ! (सारघेण) सार अर्थात् बल वा धन के पहुँचानेवाले (मधुना) ज्ञान से (मा) मुझको (अङ्क्तम्) प्रकाशित करो, (यथा) जिससे (जनान् अनु) मनुष्यों के बीच (वर्चस्वतीम्) तेजोमयी (वाचम्) वाणी को (आवदानि) मैं बोला करूँ ॥१९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य माता-पिता आदि सज्जनों से सुशिक्षा प्राप्त करके सत्य सार वचन बोलें ॥१९॥ यह मन्त्र भेद से आ चुका है-अ० ६।६९।२ ॥
टिप्पणी: १९−(सारघेण) अ० ६।६९।२। सारं घाटयति संग्राहयतीति सारघः। सारस्य बलस्य धनस्य वा संग्राहकेण। (मधुना) ज्ञानेन (अङ्क्तम्) प्रकाशयतम् (वर्चस्वतीम्) तेजोमयीम्। अन्यद् व्याख्यातम् अ० ६।६९।२ ॥
