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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो [ज्ञान] (गिरिषु) स्तुतियोग्य सन्न्यासियों में, (पर्वतेषु) मेघों में, (गोषु) गौओं में और (अश्वेषु) घोड़ों में (यत्) जो (मधु) ज्ञान है, (तत्र) उस (सिच्यमानायाम् सुरायाम्) बहते हुए जल [अथवा बढ़ते हुए ऐश्वर्य] में (यत् मधु) जो ज्ञान है, (तत्) वह (मयि) मुझ में [होवे] ॥१८॥
भावार्थभाषाः - विवेकी जन संसार के सब विद्वानों, सब प्राणियों और सब पदार्थों से गुण ग्रहण करके कीर्तिमान् होवें ॥१८॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग भेद से आचुका है-अ० ६।६९।१ ॥
टिप्पणी: १८−(गिरिषु) अ० ५।४।१। स्तूयमानेषु संन्यासिषु (पर्वतेषु) अ० ४।९।१। मेघेषु-निघ० १।१०। (सुरायाम्) अ० ६।६९।१। षुञ् अभिषवे, वा षु ऐश्वर्ये क्रन् यद्वा, षुर ऐश्वर्यदीप्त्योः-क, टाप्। जले। ऐश्वर्ये (सिच्यमानायाम्) प्रवहन्त्याम्। प्रवर्धमानायाम् (यत्) (तत्र) तस्याम्। अन्यद् गतम् ॥
