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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (भक्षाः) संग्रह करनेवाले पुरुष [अथवा भ्रमर आदि जन्तु] (इदम्) ऐश्वर्य देनेवाले (मधु) ज्ञान [रस] को (मधौ) ज्ञान [वा मधु] के ऊपर (अधि) ठीक-ठीक (न्यञ्जन्ति) मिलाते जाते हैं, (एव) वैसे ही, (अश्विना) हे चतुर माता-पिता ! (मे) मेरे लिये (वर्चः) प्रकाश, (तेजः) तीक्ष्णता, (बलम्) बल (च) और (ओजः) पराक्रम (ध्रियताम्) धरा जावे ॥१७॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष अनेक बुद्धिमानों से निरन्तर शिक्षा पाते हैं, अथवा जैसे भ्रमर आदि कीट पुष्प फल आदि से रस लेकर मधु एकत्र करते जाते हैं, वैसे ही माता-पिता अपने सन्तानों को उचित शिक्षा देकर बली और पराक्रमी बनावें ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(भक्षाः) भक्ष संघाते रोषे च-अच्। संग्रहीतारः पुरुषा भ्रमरादयः कीटा वा (इदम्) इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इदि परमैश्वर्ये कमिन्, नलोपः। परमैश्वर्यकारणम् (मधु) ज्ञानम् (न्यञ्जन्ति) अज्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु। नितरां मिश्रयन्ति (तेजः) तीक्ष्णत्वम् (बलम्) (ओजः) पराक्रमः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
