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यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतः॑ सं॒भर॑न्ति॒ मधा॒वधि॑। ए॒वा मे॑ अश्विना॒ वर्च॑ आ॒त्मनि॑ ध्रियताम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा । मधु । मधुऽकृत: । सम्ऽभरन्ति । मधौ । अधि । एव । मे । अश्विना । वर्च: । आत्मनि । ध्रियताम् ॥१.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (मधुकृतः) ज्ञान करनेवाले [आचार्य लोग] (मधु) [एक] ज्ञान को (मधौ) [दूसरे] ज्ञान पर (अधि) यथावत् (संभरन्ति) भरते जाते हैं, (एव) वैसे ही, (अश्विना) हे [कार्यकुशल] माता-पिता ! (मे आत्मनि) मेरे आत्मा में [विद्या का] (वर्चः) प्रकाश (ध्रियताम्) धरा जावे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उत्तम आचार्यों के समान एक के ऊपर एक अनेक विद्याओं का उपदेश करके शिष्यों को श्रेष्ठ बनावें ॥१६॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग आ चुका है-म० ११ ॥
टिप्पणी: १६−(मधु) ज्ञानम् (मधुकृतः) बोधकर्तारः। आचार्याः (संभरन्ति) संगृह्य धरन्ति (मधौ) ज्ञाने (अधि) यथावत्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ११ ॥