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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मधु) ज्ञान को (जनिषीय) मैं उत्पन्न करूँ, (मधु) ज्ञान की (वंशिषीय) याचना करूँ। (अग्ने) हे विद्वान् ! (पयस्वान्) गतिवाला मैं (आ अगमम्) आया हूँ, (तम्) उस (मा) मुझको (वर्चसा) [वेदाध्ययन आदि के] प्रकाश से (सम् सृज) संयुक्त कर ॥१४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ज्ञान का प्रचार और जिज्ञासा करके संसार में कीर्ति प्राप्त करें ॥१४॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग आ चुका है-अ० ७।८९।१ ॥
टिप्पणी: १४−(मधु) म० १। ज्ञानम् (जनिषीय) जनी प्रादुर्भावे, छन्दसि प्रादुष्करणे-आशीर्लिङ्। प्रादुष्क्रियासम् (वंशिषीय) वनु याचने-आशीर्लिङि छान्दसं रूपम्। अहं वनिषीय। याचिषीय। अन्यत् पूर्ववत्-अ० ७।८९।१ ॥
