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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (सोमः) ऐश्वर्यवान् [वृद्ध पुरुष] (तृतीये सवने) तीसरे यज्ञ [वृद्ध अवस्था] में (ऋभूणाम्) बुद्धिमानों का (प्रियः) प्रिय (भवति) होता है। (एव) वैसे ही (ऋभवः) हे बुद्धिमानो ! (मे आत्मनि) मेरे आत्मा में (वर्चः) प्रकाश (ध्रियताम्) धरा जावे ॥१३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रयत्न करें कि उत्तम शिक्षण और परीक्षण से वे वृद्धपन में माननीय होवें ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(सोमः) ऐश्वर्यवान्। वृद्धपुरुषः (तृतीये) शैशवयौवनवार्धकानां पूरके (सवने) यज्ञे। वृद्धभाव इत्यर्थः। (ऋभूणाम्) अ० १।२।३। मेधाविनाम्-निघ० ३।१५। (ऋभवः) हे मेधाविनः। शिष्टं पूर्ववत् ॥
