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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (सोमः) ऐश्वर्यवान् आत्मा। [बालक] (प्रातःसवने) प्रातःकाल के यज्ञ [बालकपन] में (अश्विनोः) [कार्यकुशल] माता-पिता का (प्रियः) प्रिय (भवति) होता है। (एव) वैसे ही, (अश्विना) हे [कार्यकुशल] माता-पिता ! (मे) मेरे (आत्मनि) आत्मा में [विद्या का] (वर्चः) प्रकाश (ध्रियताम्) धरा जावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार चतुर माता-पिता अपने होनहार बालक का हित करते हैं, उसी प्रकार सब निपुण माता-पिता और आचार्य बालकों को शिक्षा देकर उत्तम बनावें ॥११॥
टिप्पणी: ११−(सोमः) ऐश्वर्यवान् बालकः। आत्मा-निरु० १४।१२। (प्रातःसवने) अ० ६।४७।१। प्रातःकालस्य यज्ञे। शैशव इत्यर्थः (अश्विनोः) अ० २।२९।६। अश्विनौ....राजानौ पुण्यकृतौ-निरु० १२।१। कार्येषु व्याप्तिमतोर्जननीजनकयोः (भवति) (प्रियः) प्रीतिपात्रम् (एव) तथा (मे) मम (अश्विना) हे चतुरमातापितरौ (वर्चः) विद्याप्रकाशः (आत्मनि) अन्तःकरणे (ध्रियताम्) स्थाप्यताम् ॥
