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स्त॑नयि॒त्नुस्ते॒ वाक्प्र॑जापते॒ वृषा॒ शुष्मं॑ क्षिपसि॒ भूम्या॒मधि॑। अ॒ग्नेर्वाता॑न्मधुक॒शा हि ज॒ज्ञे म॒रुता॑मु॒ग्रा न॒प्तिः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्तनयित्नु: । ते । वाक् । प्रजाऽपते । वृषा । शुष्मम् । क्षिपसि । भूम्याम् । अधि । अग्ने: । वातात् । मधुऽकशा । हि । जज्ञे । मरुताम् । उग्रा । नप्ति: ॥१.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजापते) हे प्रजापालक ! [परमेश्वर !] (ते) तेरी (वाक्) वाणी (स्तनयित्नुः) मेघ की गर्जन [समान] है, (वृषा) तू ऐश्वर्यवान् होकर (शुष्मम्) बल को (भूम्याम्) भूमि पर (अधि) अधिकारपूर्वक (क्षिपसि) फैलाता है। (मरुताम्) शूर पुरुषों की (उग्रा) प्रबल (नप्तिः) न गिरनेवाली शक्ति, (मधुकशा) मधुकशा [ब्रह्मविद्या] (हि) ही (अग्नेः) अग्नि से और (वातात्) वायु से (जज्ञे) प्रकट हुई है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की वेदवाणी स्पष्टरूप से संसार का हित करती है ॥१०॥ इस मन्त्र का उत्तर भाग मन्त्र ३ में ऊपर आया है ॥
टिप्पणी: १०−(स्तनयित्नुः) अ० १।—१३।१। मेघशब्द इव (ते) तव (वाक्) मधुकशा (प्रजापते) हे प्रजारक्षक परमात्मन् (वृषा) अ० १।१२।१। ऐश्वर्यवान् (शुष्मम्) बलम्-निघ० २।९। (क्षिपसि) प्रसारयसि (भूम्याम्) (अधि) अधिकृत्य। अन्यत् पूर्ववत्-म० ™३ ॥