पदार्थान्वयभाषाः - (उपरि) ऊपर विराजमान (वैश्वानरस्य) सब नरों के हितकारी [परमेश्वर] की (प्रतिमा) प्रतिमा [आकृति समान] (द्यौः) आकाश है, (यावत्) जितना कि (अग्निः) अग्नि [सर्वव्यापक परमेश्वर] ने (रोदसी) सूर्य और पृथिवी लोक को (विबबाधे) अलग-अलग रोका है। (ततः) उसी के कारण (अमुतः) उस (षष्ठात्) छठे [परमेश्वर म० ४] से (अह्नः) दिन [प्रकाश] के (स्तोमाः) स्तुतियोग्य गुण [सृष्टिकाल में] (आ यन्ति) आते हैं, और (इतः) यहाँ से (षष्ठम् अभि) छठे [परमेश्वर] की ओर [प्रलय समय] (उत् यन्ति) ऊपर जाते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - आकाशसमान सर्वव्यापक और पञ्चभूतों की अपेक्षा छठे [म० ४] परमेश्वर ने सूर्य पृथिवी आदि लोकों को प्राणियों के उपकार के लिये अलग-अलग किया है, उसके ही सामर्थ्य से प्रकाश आदि प्रकट और लुप्त होते हैं ॥६॥ परमेश्वर आकाशसमान व्यापक है, जैसा कि यजुर्वेद−४०।१७। का वचन है [खं ब्रह्म] सबका रक्षक ब्रह्म आकाश [के तुल्य व्यापक है] ॥